Wednesday, March 7, 2012

The wrong way of Liberalization

भारत में एक प्रधानमंत्री हुए मोरारजी देसाई उनकी सरकार ने भारत में जितने भी Zero Technology के क्षेत्र में MNC (Multi National Company) काम कर रहे थे उनमे से अधिकांश को भारत से भगाया था | ये Zero Technology वाले उत्पादों की संख्या लगभग 700 थी | और आप ध्यान दीजियेगा कि ये जितने भी MNC आये हैं वो उन्हीं क्षेत्रों में निवेश कर रहे हैं जिस क्षेत्र को मोरारजी देसाई की सरकार ने प्रतिबंधित किया था | मतलब जिन कंपनियों को मोरारजी देसाई की सरकार ने भगाया था सब की सब वापस आ गयी हैं | दूसरी बात, जितने भी MNC हैं वो कभी भी हमारे देश में आ के कोई technology के क्षेत्र में निवेश नहीं करते हैं | क्या कभी किसी कंपनी ने आ के यहाँ satellite बनाया या किसी ने मिसाइल बनाने में मदद की ? Technology इस देश में बाहर से जो भी आती है वो outdated /redundant होती है | 1991 में उदारीकरण (जिसे मैं उधारीकरण कहता हूँ ) के बाद जितने भी MoU (Memorandum of Understanding) sign हुए इस देश में सब के सब zero technology के क्षेत्र में हुए हैं | आप देखिएगा कि ये क्या बनाती हैं और बेचती हैं, ये बनाती है - साबुन,वाशिंग पावडर, आलू का चिप्स, टमाटर की चटनी, आम का आचार, बोतल का पानी, चोकलेट, बिस्कुट, पावरोटी, आदि, आदि | एक भी उदहारण कोई दे दे जब इन विदेशी कंपनियों ने तकनीक के क्षेत्र में निवेश किया हो | भारत ने अपने स्वदेशी तकनीक से सुपर कंप्यूटर बनाया, भारत ने अपने बूते मिसाइल बनाया, भारत ने अपने दम पर क्रायोजनिक इंजन बनाया, एक भी कंपनी ने भारत को तकनीक तो दूर सहयोग तक नहीं दिया | मारुती में जो सुजुकी का इंजन लगता है वो इंजन यहाँ नहीं जापान में बनता है, हीरो होंडा में जो इंजन लगता था वो जापान से बन के आता था , मतलब ये है कि अपने तकनीक को ये कम्पनियाँ शेयर नहीं करती वो कोई तकनीक जानते हैं तो आपको देते नहीं हैं और जब वही तकनीक उनके लिए पुरानी या बेकार हो जाती है तो वो उसे भारत में ला के dump कर देती हैं और हम खुश हो जाते हैं कि नयी तकनीक आयी है |

आप दुनिया में जितने भी विकसित देश देखेंगे वो सब स्वदेशी के बल पर आगे आये हैं | भारत को भी खड़ा करना है तो स्वदेशी के माध्यम से ही खड़ा किया जा सकता है | अगर आप विदेशियों पर निर्भर हैं या परावलम्बी है तो आप दुनिया में कभी कोई ताकत हासिल नहीं कर सकते | विदेशी वैसाखी पर, परावलम्बी होकर, विदेशी चिंतन से, विदेशी अर्थव्यवस्था की नीतियों की नक़ल से कोई देश कभी आगे नहीं आता, हर देश को आगे आने के लिए स्वदेशी का चिंतन, स्वदेशी का मनन और स्वदेशी का अनुपालन करना पड़ता है |

15 अगस्त 1947 को भारत ऐसा नहीं था, भारत के ऊपर एक रूपये का विदेशी कर्ज नहीं था, भारत का व्यापार घाटा एक रूपये का नहीं था | एक डौलर की कीमत भारत के एक रुपया के बराबर थी, एक पोंड की कीमत एक रुपया के बराबर थी और एक जर्मन मार्क की कीमत भी एक रुपया थी, भारत आजाद हुआ तो भारत को आगे की तरफ बढ़ना चाहिए था लेकिन हुआ उल्टा | हमारे नीति निर्धारकों ने भारत को पश्चिम के रास्ते आगे बढ़ाने का प्रयास किया जो कि किसी भी दृष्टिकोण से बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती है | आज का भारत कर्ज में डूबा हुआ भारत है, भारत की हर प्राकृतिक चीज विदेशियों के हाथ में चली गयी है, अब तो भारत के लोग भी भारतीय नहीं रहे, जब कोई राष्ट्र की बात करता है तो लोग उसे ही गालिया देने लगते हैं | मैं भारत में पैदा हुआ और भारत की संस्कृति में पला-बढ़ा, और हमारे भारत की संस्कृति में मरने वाले के आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है लेकिन मैं भगवान से ये प्रार्थना करता हूँ कि इन 64 सालों में जिन-जिन शासकों ने भारत को इस दुष्चक्र में पहुँचाया है, उनकी आत्मा को कभी शांति प्रदान ना करें |....................

No comments:

Post a Comment